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भगवद गीता 9.22

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

जो लोग अनन्य भाव से, सदा स्थिर रहकर मेरा स्मरण और पूजा करते हैं, उनकी जो कमी है वह मैं पूरी करता हूँ, और जो उनके पास है उसकी रक्षा करता हूँ।
  • faith
  • devotion
  • trust
  • anxiety

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक श्रद्धा और चिंता से जुड़ता है।

चिंतन

अगर जो तुम्हें चाहिए वह पहले से ही रास्ते में हो, बस अभी तुम उसे देख नहीं पा रहे, तो क्या?

एक छोटा अभ्यास

आज जब भविष्य को लेकर चिंता हो, तो इस पंक्ति के साथ साँस लो: मुझे सम्हाला जा रहा है।

अध्याय 9

राज विद्या राज गुह्य योग

भक्ति, सबसे सीधा रास्ता। जो तुम सच्चे मन से चढ़ाओ, पत्ता, फूल, फल, पानी, वह दिव्य तक पहुँच जाता है।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

9.22 पर धर्म से पूछें