भगवद गीता 6.35
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
“हे महाबाहु, इसमें कोई संदेह नहीं कि मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। पर अभ्यास और वैराग्य से इस पर विजय पाई जा सकती है।”- mind
- overthinking
- anxiety
- discipline
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक चिंता से जुड़ता है।
✦ चिंतन
भटकता मन असफल अभ्यास नहीं है। वही तो अभ्यास है।
✦ एक छोटा अभ्यास
आज जब मन भटके, तो उसे प्यार से वापस लाओ। डाँटो मत। बस लौट आओ।
अध्याय 6
ध्यान योग
भीतर का अभ्यास: आसन, मुद्रा, साँस, और चंचल मन को धीरे-धीरे साधने की लम्बी साधना।
ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है
ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।
मैं हर बात पर इतना क्यों सोचता हूँ, और इसे कैसे रोकूँ?
कुछ भी ग़लत न हो, फिर भी मन रुकने का नाम नहीं लेता।
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ENजब करियर को लेकर उलझन हो, तब क्या करूँ?
आप फँसे नहीं हैं, बस अभी तस्वीर साफ़ नहीं है।
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ENWhy do I keep procrastinating even on things I care about?
You want to do it. You just cannot seem to start.
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इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
6.35 पर धर्म से पूछें