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भगवद गीता 6.19

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥

जैसे हवा से रहित जगह में दीपक नहीं लड़खड़ाता, यही उपमा उस योगी के नियंत्रित मन के लिए दी गई है जो आत्मा से एकता का अभ्यास कर रहा है।
  • mind
  • meditation
  • stillness
  • concentration

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 6 से है।

चिंतन

स्पष्ट महसूस करने के लिए तुम्हें शांत दुनिया नहीं चाहिए। तुम्हें अपने उस हिस्से की ज़रूरत है जहाँ तक दुनिया पहुँच ही नहीं सकती।

एक छोटा अभ्यास

तीन मिनट शांत बैठो। विचारों से लड़ो मत, बस स्थिरता के चारों ओर उन्हें होने दो।

अध्याय 6

ध्यान योग

भीतर का अभ्यास: आसन, मुद्रा, साँस, और चंचल मन को धीरे-धीरे साधने की लम्बी साधना।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

6.19 पर धर्म से पूछें