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भगवद गीता 5.22

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥

हे कुंती-पुत्र, इंद्रिय-संपर्क से पैदा होने वाले भोग दुख के ही कारण हैं, जिनका आदि है और अंत भी है। विवेकी इनमें रमण नहीं करते।
  • desire
  • suffering
  • addiction
  • pleasure

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 5 से है।

चिंतन

जिस चीज़ की ओर तुम बार-बार बेहतर महसूस करने के लिए हाथ बढ़ाते हो, ग़ौर करो, वह तुम्हें कितनी बार थोड़ा और बुरा छोड़कर जाती है।

एक छोटा अभ्यास

आज एक छोटी आदत वाली खुशी को छोड़ दो। देखो उसकी जगह क्या है।

अध्याय 5

कर्म संन्यास योग

संन्यास का मतलब कर्म न करना नहीं है, कर्म को ऐसे करना है कि वह तुम पर चिपके ही नहीं, जैसे पानी में कमल का पत्ता।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

5.22 पर धर्म से पूछें