Englishहिन्दी
भगवद गीता 6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
“अपने आप को अपने ही द्वारा ऊपर उठाओ; ख़ुद को डूबने मत दो। क्योंकि आत्मा ही आत्मा की मित्र है, और आत्मा ही आत्मा की शत्रु है।”- self
- depression
- hopelessness
- discipline
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक निराशा से जुड़ता है।
✦ चिंतन
तुम्हें बचाने कोई नहीं आ रहा। यह कठोर नहीं है, यहीं से तुम्हारी असली ताक़त शुरू होती है।
✦ एक छोटा अभ्यास
आज एक ऐसा काम करो जिसके लिए तुम किसी और का इंतज़ार कर रहे थे।
अध्याय 6
ध्यान योग
भीतर का अभ्यास: आसन, मुद्रा, साँस, और चंचल मन को धीरे-धीरे साधने की लम्बी साधना।
ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है
ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।
इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
6.5 पर धर्म से पूछें