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भगवद गीता 5.10

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥

जो व्यक्ति सभी कर्म परम को अर्पित करके, आसक्ति त्यागकर काम करता है, वह पाप से अछूता रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी से अछूता रहता है।
  • surrender
  • guilt
  • action
  • non-attachment

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक समर्पण और अपराध-बोध से जुड़ता है।

चिंतन

तुम कठिन काम कर सकते हो बिना उससे रँगे जाए। रँग जाना एक चुनाव है।

एक छोटा अभ्यास

आज एक काम पूरा करो और उसे छोड़ दो। उसे अगले काम में मत ढोओ।

अध्याय 5

कर्म संन्यास योग

संन्यास का मतलब कर्म न करना नहीं है, कर्म को ऐसे करना है कि वह तुम पर चिपके ही नहीं, जैसे पानी में कमल का पत्ता।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

5.10 पर धर्म से पूछें