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भगवद गीता 4.39

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

श्रद्धावान, ज्ञान के प्रति समर्पित और इंद्रियों पर संयम रखने वाला, ज्ञान को पा लेता है, और ज्ञान पाकर बिना देरी के परम शांति को प्राप्त करता है।
  • faith
  • knowledge
  • peace

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक श्रद्धा से जुड़ता है।

चिंतन

यहाँ श्रद्धा का मतलब यक़ीन होना नहीं है। इसका मतलब है, सबूत मिलने से पहले भी अभ्यास में लगे रहना।

एक छोटा अभ्यास

आज एक छोटा काम वह करो जो तुम्हारा सबसे बुद्धिमान रूप करता, भले ही अभी तुम उस पर पूरी तरह भरोसा न कर पा रहे हो।

अध्याय 4

ज्ञान कर्म संन्यास योग

अर्पण के भाव से किया गया कर्म स्वयं ज्ञान का रूप बन जाता है। यह वही अध्याय है जो बार-बार कहता है, ज्ञान जिसे छूता है, उसे पवित्र कर देता है।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

4.39 पर धर्म से पूछें