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भगवद गीता 3.27

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

सारे कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं; अहंकार से मोहित आत्मा सोचती है, 'मैं ही कर्ता हूँ।'
  • ego
  • control
  • humility

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक नियंत्रण से जुड़ता है।

चिंतन

आज तुम जो कर रहे हो, उसमें 'तुम्हारा' उतना नहीं है जितना तुम सोचते हो। बहुत से हाथ और बहुत से कारण तुम्हारे ज़रिए काम कर रहे हैं।

एक छोटा अभ्यास

आज जब तुम श्रेय लो, तो चुपचाप मन में जोड़ो: 'और बहुत-सी चीज़ें जो मैंने नहीं देखीं।'

अध्याय 3

कर्म योग

क्यों कोई भी कर्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकता, और कैसे संसार में कर्म करते हुए भी उससे न बँधा जाए।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

3.27 पर धर्म से पूछें