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भगवद गीता 2.56

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

जिसका मन दुख में विचलित नहीं होता, जो सुख में लालसा से मुक्त है, और जिससे आसक्ति, भय और क्रोध जा चुके हैं, वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि कहलाता है।
  • equanimity
  • anxiety
  • fear
  • anger
  • suffering

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक चिंता से जुड़ता है।

चिंतन

स्थिर होने का मतलब कम महसूस करना नहीं है। इसका मतलब है, पूरी तरह महसूस करो, पर उसमें बह न जाओ।

एक छोटा अभ्यास

आज जब कुछ तुम्हें हिला दे, तो उस भावना का नाम ज़ोर से कहो। देखो क्या बदलता है।

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.56 पर धर्म से पूछें