भगवद गीता 2.55
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
“हे पार्थ, जब मनुष्य मन की सभी इच्छाओं को त्याग देता है, और अपनी आत्मा में अपने आप से ही संतुष्ट रहता है, तब वह स्थिर बुद्धि वाला कहा जाता है।”- desire
- contentment
- self
- wisdom
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 2 से है।
✦ चिंतन
एक शांत-सी खुशी है जिसे आने के लिए कुछ नहीं चाहिए। वह तुम्हारे सोचने से कहीं ज़्यादा पास है।
✦ एक छोटा अभ्यास
आज एक ऐसा क्षण खोजो जब कुछ भी कमी न हो। तीन साँसों तक वहीं ठहरो।
अध्याय 2
सांख्य योग
कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।
ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है
ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।
दूसरों की कामयाबी देखकर जलन क्यों होती है?
उनकी आगे बढ़ना अपनी हार जैसा लगता है।
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ENसब कुछ ठीक लगने पर भी ज़िंदगी में खोया-खोया क्यों महसूस होता है?
बाहर से सब ठीक है, पर अंदर कुछ है जो सही नहीं लगता।
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ENछोटी-छोटी बातों पर इतनी जल्दी ग़ुस्सा क्यों आ जाता है?
बात जितनी है, प्रतिक्रिया उससे कहीं ज़्यादा बड़ी लगती है।
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EN
इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
2.55 पर धर्म से पूछें