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भगवद गीता 2.40

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥

इस रास्ते पर कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता, और न ही कोई उलटा फल होता है। इस धर्म का थोड़ा-सा अभ्यास भी बड़े भय से रक्षा करता है।
  • fear
  • effort
  • perseverance
  • starting

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 2 से है।

चिंतन

छोटे-छोटे प्रयास तुम्हारे अंदर काम करते रहते हैं, भले ही बाहर कुछ होता न दिखे।

एक छोटा अभ्यास

किसी छोटे प्रयास को बेकार कहने से पहले, उसे एक दिन और दो।

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.40 पर धर्म से पूछें