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भगवद गीता 2.38

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय को समान मानकर फिर अपने कर्म में लग जाओ। ऐसा करने से तुम पर कोई दोष नहीं लगेगा।
  • equanimity
  • duty
  • results
  • anxiety

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक नतीजों और चिंता से जुड़ता है।

चिंतन

शांति से काम करने के लिए शांत महसूस करना ज़रूरी नहीं है। तुम्हें बस अंदर एक छोटी-सी स्थिर जगह चाहिए, जहाँ से तुम काम कर सको।

एक छोटा अभ्यास

आज एक छोटा काम करो, बिना इस चिंता के कि उसका नतीजा क्या होगा।

अध्याय 2

सांख्य योग

कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

2.38 पर धर्म से पूछें