भगवद गीता 2.20
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
“आत्मा न तो कभी जन्म लेती है, न कभी मरती है। यह न थी, ऐसा नहीं; न है, ऐसा नहीं; न होगी, ऐसा नहीं। यह अजन्मा है, नित्य है, शाश्वत है, पुरातन है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह नष्ट नहीं होती।”- grief
- death
- self
- atman
- fear
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 2 से है।
✦ चिंतन
तुम्हारे अंदर कुछ ऐसा है जो न कभी जन्मा, न कभी मरेगा। डर उस हिस्से तक नहीं पहुँच सकता।
✦ एक छोटा अभ्यास
जब डर लगे, तो एक हाथ अपनी छाती पर रखो। साँस लो। याद रखो कि तुम्हारे अंदर कुछ पहले से ही सुरक्षित है।
अध्याय 2
सांख्य योग
कृष्ण यहाँ अमर आत्मा का परिचय देते हैं, कर्म के कर्तव्य की बात करते हैं, और उस मन का आदर्श रखते हैं जो सुख और दुख दोनों में स्थिर रहे।
ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है
ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।
Should I Quit My Job? A Bhagavad Gita Perspective on Work, Dread, and Purpose
The salary feels like a reason to stay. The dread feels like a reason to leave.
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ENसब कुछ ठीक लगने पर भी ज़िंदगी में खोया-खोया क्यों महसूस होता है?
बाहर से सब ठीक है, पर अंदर कुछ है जो सही नहीं लगता।
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ENWhy do I keep procrastinating even on things I care about?
You want to do it. You just cannot seem to start.
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गहरा चिंतन
इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
2.20 पर धर्म से पूछें