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भगवद गीता 4.18
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥
“जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह लोगों में बुद्धिमान है; वही योग में स्थित है, और वही सारे कर्म करने वाला है।”- action
- wisdom
- discernment
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 4 से है।
✦ चिंतन
स्थिरता आलस्य नहीं है। और व्यस्त होना, करना नहीं है।
✦ एक छोटा अभ्यास
आज दो मिनट शांत बैठो। देखो अंदर कितना कुछ अब भी हो रहा है।
अध्याय 4
ज्ञान कर्म संन्यास योग
अर्पण के भाव से किया गया कर्म स्वयं ज्ञान का रूप बन जाता है। यह वही अध्याय है जो बार-बार कहता है, ज्ञान जिसे छूता है, उसे पवित्र कर देता है।
इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
4.18 पर धर्म से पूछें