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भगवद गीता 3.5

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

कोई भी एक क्षण के लिए भी कर्म किए बिना नहीं रह सकता; हर कोई प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा विवश होकर कर्म में लगाया जाता है।
  • action
  • duty
  • avoidance
  • inertia

यह श्लोक किस बारे में है

यह श्लोक भगवद गीता के अध्याय 3 से है।

चिंतन

किसी चीज़ से बचना भी कुछ करना ही है। जो तुम नहीं कर रहे हो, वह भी तुम्हारी ज़िंदगी को गढ़ रहा है।

एक छोटा अभ्यास

एक ऐसी चीज़ का नाम लो जिससे तुम बचते आ रहे हो। आज उसके पाँच मिनट करो।

अध्याय 3

कर्म योग

क्यों कोई भी कर्म से पूरी तरह बाहर नहीं निकल सकता, और कैसे संसार में कर्म करते हुए भी उससे न बँधा जाए।

ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है

ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।

इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।

धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।

3.5 पर धर्म से पूछें