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भगवद गीता 12.15
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
“जिससे दुनिया विचलित नहीं होती, और जो दुनिया से विचलित नहीं होता; जो हर्ष, असहिष्णुता, भय और व्यग्रता से मुक्त है, वह मुझे प्रिय है।”- equanimity
- anxiety
- fear
- relationships
यह श्लोक किस बारे में है
यह श्लोक चिंता से जुड़ता है।
✦ चिंतन
कुछ शांति बस अपनी रक्षा करना है। असली शांति दूसरों को भी परेशान नहीं करती।
✦ एक छोटा अभ्यास
ग़ौर करो कि तुम किस तरह चुपचाप दूसरों को बेचैन करते हो। बस एक बार, उसे रोक दो।
अध्याय 12
भक्ति योग
कृष्ण को जो प्रिय है, उसके लक्षण: मित्रता, समता, भय से मुक्ति, क्षमा, और एक शांत मन।
ये मन के सवाल जिनसे यह श्लोक जुड़ता है
ऐसे सवाल जो असली लोग मन में उठाते हैं, और जिन पर यह श्लोक कुछ कहता है।
इस श्लोक के साथ थोड़ी देर और ठहरिए।
धर्म से पूछें कि यह श्लोक आपके जीवन में कैसे उतर सकता है, और एक शांत, श्लोक-आधारित चिंतन प्राप्त करें।
12.15 पर धर्म से पूछें